Thursday, December 8, 2022

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मुख्यमंत्री बदलने में क्यों चूक जाती है कांग्रेस? असम, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान में फिर वही होगा अंजाम!


नई दिल्ली : कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा और राष्ट्रीय अध्यक्ष पद चुनाव की चर्चा के बीच पार्टी के लिए नया सियासी संकट खड़ा हो गया है। खास बात है कि इस संकट के पीछे का कारण कोई बाहरी नहीं बल्कि पार्टी के भीतर ही है। राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलने की सुगबुगाहट क्या हुई पार्टी के विधायकों ने विद्रोह का बिगुल ही फूंक दिया। कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री बदलने का इतिहास बड़ा ही दर्द देने वाला रहा है। पिछले तीन दशक का इतिहास तो यही दिखाता। पुड्डुचेरी से लेकर आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब तक पार्टी ने जब-जब मुख्यमंत्री बदला है उसको बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। इतना ही नहीं हाल के समय में पार्टी को तीन युवा चेहरों से भी हाथ धोना पड़ा है। अगर इतिहास फिर से खुद को दोहरा दे तो राजस्थान में भी पार्टी को बड़ा झटका लग जाए तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। अब सवाल उठता है सबसे पुरानी पार्टी आखिर मुख्यमंत्री बदलने की कवायद में कहां चूक जाती है।

पंजाब : कांग्रेस ने ‘कैप्टन’ के साथ सत्ता भी गंवाई गंवाया
शुरुआत पंजाब से ही कर लेते हैं। कांग्रेस ने यहां मोदी लहर में पार्टी की जीत का झंडा बुलंद करने वाले कैप्टन को बदलने का फैसला किया। सिद्धू के दबाव में पार्टी ने उन्हें हटाया। आनन-फानन में चुनाव से कुछ महीने पहले दलित चेहरे के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसका फायदा तो पार्टी को नहीं हुआ बल्कि विधानसभा चुनाव में खामियाजा जरूर भुगतना पड़ा। पार्टी महज 18 सीटों पर सिमट गई। कैप्टन ने पहले अपनी अलग पार्टी बनाई और कुछ दिन पहले ही पार्टी का बीजेपी में विलय कर खुद भी कमल थाम लिया। पंजाब में पार्टी ने स्थानीय नेतृत्व और विधायकों का मूड समझने में गलती कर दी। सिद्धू के दबाव में उठाया गया कदम पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो गया। कांग्रेस की कमजोरी का फायदा यहां आम आदमी पार्टी को मिला। वह बंपर बहुमत के साथ सत्ता में आई।

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मध्यप्रदेश : सिंधिया बनाम कमलनाथ में झटका
मध्यप्रदेश में पार्टी 15 साल बाद साल 2017 में सत्ता में लौटी। पार्टी की इस जीत में युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने काफी अहम भूमिका अदा की थी। बाद जब मुख्यमंत्री चुनने की आई तो पार्टी ने यहां अपने पुराने वफादार और करीबी कमलनाथ को तरजीह दी। इसका नतीजा पार्टी दो धड़ों में बंट गई। स्थिति यह हो गई कि गुटबाजी की वजह से दो साल में पार्टी राज्य की सत्ता से बाहर हो गई। पार्टी आलाकमान से नाराज होकर राहुल गांधी के करीबी माने जाने ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़ दी। ज्योतिरादित्य सिंधिया फिलहाल एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं।

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असम : हिमंत बिस्वा सरमा ने दिया था इस्तीफा
असम में कांग्रेस को वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई और हिमंत बिस्वा सरमा की प्रतिद्वंद्विता का नुकसान उठाना पड़ा था। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नाराज होकर हिमंत बिस्वा सरमा ने साल 2015 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। साल 2016 में हिमंत ने दावा किया था कि राहुल गांधी नेताओं से बात करने की अपेक्षा अपने कुत्तों के साथ खेलना अधिक पसंद करते हैं। इससे पहले साल 2011 में असम में कांग्रेस की जीत के पीछे हिमंत की बड़ी भूमिका थी। साल 2014 में उनकी सीएम तरुण गोगोई से अनबन शुरू हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 2015 में ही बीजेपी जॉइन कर ली थी। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव वह ना सिर्फ बीजेपी को सत्ता में लाए बल्कि मुख्यमंत्री भी बने। इस तरह पार्टी ने युवा नेतृत्व की अनदेखी कर खुद का बड़ा नुकसान किया।

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आंध्र प्रदेश : जगन को दरकिनार कर रोसैया को बनाया था सीएम
आंध्र प्रदेश में साल 2009 में तत्कालीन सीएम वाईएसआर राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर क्रैश में मौत के बाद पार्टी ने उनके बेटे ने सीएम पद पर दावा ठोका था। पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता के. रोसैया को सीएम बनाया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी में विभाजन हो गया। जगन ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी वाईएसआर कांग्रेस बना ली। इसके बाद जगन ने राज्यभर की यात्रा की। साल 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में जगन ने सत्ता में वापसी की। आज वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

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पुड्डुचेरी : 2008 में सीएम बदलना पड़ा था भारी
पार्टी को साल 2008 में केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी में सीएम बदलना भारी पड़ा था। कांग्रेस ने तत्कालीन सीएम एन. रंगासामी को जबरदस्ती हटाकर वी. वैतीलिंगम को मुख्यमंत्री बनाया था। साल 2011 में रंगासामी ने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने अपनी नई पार्टी एनआर कांग्रेस का गठन किया। इसके बाद उन्होंने बीजेपी से हाथ मिला लिया। इसका नतीजा हुआ कि कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी। यहां राष्ट्रपति शासन लगा। बाद में चुनाव हुआ और अब रंगासामी पुडुच्चेरी के मुख्यमंत्री हैं।

बीजेपी ने 5 सीएम बदले, कुछ भी नहीं
कांग्रेस के उलट बीजेपी का इतिहास इस मायने में काफी बेहतर है। पार्टी ने पिछले साल 6 महीने के भीतर ही पांच मुख्यमंत्री बदल दिए। बदलने वाले मुख्यमंत्रियों में उत्तराखंड से त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत, गुजरात के विजय रुपाणी, कर्नाटक में येदियुरप्पा, और असम में सर्वानंद सोनोवाल शामिल थे। इसके बावजूद पार्टी ने ना कही विरोध हुआ और ना ही किसी तरह की गुटबाजी देखने को मिली। इससे एक बात तो साफ है कि कांग्रेस की तुलना में बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व कहीं अधिक मजबूत दिखाई देता है। इसके उलट कांग्रेस में छत्रप पार्टी पर भारी पड़ते हैं। पंजाब में अमरिंदर सिंह के बाद राजस्थान में अशोक गहलोत का कद भी ऐसा ही है। यदि एक साथ 90 विधायक सामूहिक इस्तीफा देने को तैयार हैं तो इससे गहलोत की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है।



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