Thursday, December 8, 2022

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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मंदिर प्रबंध समितियां राजनीतिक जागीर नहीं हो सकतीं



supreme court
– फोटो : पीटीआई

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा, मंदिरों की प्रबंध समितियां राजनीतिक जागीर नहीं हो सकतीं। मंदिरों के प्रबंधन को राजनीति और पार्टी लाइन से अलग किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने किसी भी सत्तारूढ़ दल द्वारा अपने विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को धार्मिक ट्रस्टों की प्रबंधन समितियों को शामिल करने की प्रथा को अस्वीकार कर दिया।

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रवि कुमार की पीठ ने शिरडी के श्री साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट की प्रबंध समिति से जुड़े मामले की सुनवाई में यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, अब समय आ गया है जब राजनीतिक दलों को पार्टी लाइन से ऊपर उठकर भक्तों के हित में पूजा स्थलों के प्रशासन को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए। राजनेता कुछ मंदिरों को लेकर इतने सक्रिय क्यों हो जाते हैं और प्रबंधन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं? 

जो भी प्रबंधन में आता है, वे विभिन्न कारणों से अपने लोगों को उसमें शामिल करता है। पीठ ने पाया कि साईंबाबा ट्रस्ट की प्रबंध समिति, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 सितंबर को एक आदेश से खत्म कर दिया था, उसमें एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के सदस्य शामिल थे। महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से सहमति जताई और कहा, धार्मिक स्थलों की प्रबंध समितियां राजनीतिक जागीर नहीं बन सकतीं।

महाराष्ट्र में हुए सत्ता परिवर्तन को इस मामले में उठाना होगा कदम
यह इंगित करते हुए कि महाराष्ट्र में राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन आ गया है, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि उसका प्रयास व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना होना चाहिए ताकि सार्वजनिक ट्रस्ट, जो पूजा स्थलों का प्रबंधन करते हैं, राजनेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए अभयारण्य न बन जाए।

मानसिक रोगी कैदियों को जंजीर से बांधने पर केंद्र व मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस
मध्य प्रदेश के रतलाम में स्थित मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में कैदियों को जंजीर में बांधकर रखने को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस एसए नज़ीर और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने स्वास्थ्य मंत्रालय, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, मध्य प्रदेश सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को जवाब मांगते हुए नोटिस जारी किया है। ये याचिका अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने दायर की है। इसमें रतलाम जिले में हुसैन टेकरी तीर्थस्थान के पास स्थित मानसिक स्वास्थ्य सुविधा में कैदियों को खोलने के निर्देश देने की मांग की गई है। ब्यूरो

याचिका दायर करना शौक नहीं हो सकता, जुर्माना लगाया
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राजनीतिक दलों के लिए चुनाव चिह्न आरक्षित किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय किशन कौल व एएस आका की पीठ ने कहा कि याचिका दायर करना या मुकदमेबाजी शौक का विषय नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। असल में याचिकाकर्ता ने 2021 में इलाहबाद हाईकोर्ट में याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। इलाहबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दायर कर कहा गया था कि चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न आवंटित करने का अधिकार नहीं है।

सरोगेसी कानून को चुनौती वाली याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब
सरोगेसी (विनियमन) एक्ट और उसके सहायक कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि ये कानून गोपनीयता और महिलाओं के प्रजनन अधिकारों के खिलाफ हैं। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। चेन्नई निवासी अरुण मुथुवेल ने ये याचिका एडवोकेट मोहिनी प्रिया के माध्यम से दायर की है।

झूठी जानकारी देने वाले कर्मी को नौकरी से निकालना गलत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, झूठे दस्तावेज देने वाले कर्मी को नौकरी से निकाला जा सकता है। खासतौर से फिटनेस या पद के लिए उपयुक्तता संबंधी जानकारी छिपाने पर। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा, ऐसे मामले में भी जहां कर्मचारी ने निपटारा हो चुके आपराधिक मामले की सही घोषणा की गई हो, नियोक्ता के पास उसके पिछले जीवन पर विचार करने का अधिकार है और उसे इस उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

किशोर न्याय कानून में संशोधन याचिका पर केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में हालिया संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। इसके तहत बच्चों के खिलाफ कुछ श्रेणियों के अपराधों को गैर-संज्ञेय बनाया गया है। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

विज्ञापनों पर सार्वजनिक धन का उपयोग…केंद्र-राज्यों को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों पर सार्वजनिक धन खर्च करने के खिलाफ एनजीओ कॉमन कॉज की याचिका पर केंद्र व राज्यों को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता संगठन का कहना है कि सार्वजनिक धन का इस तरीके से इस्तेमाल पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण, मनमाना और विश्वास का उल्लंघन है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील वकील प्रशांत भूषण और चेरिल डिसूजा ने राज्य सरकारों को अपने क्षेत्र के बाहर विज्ञापन प्रकाशित करने से रोकने के लिए एक आदेश की मांग की। इसमें राज्य में हितधारकों को व्यापार शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित करने या पर्यटन और निजी निवेश को आकर्षित करने जैसे विज्ञापनों को छोड़ दिया गया। उन्होंने दावा किया कि ऐसा करना ऑफिस का दुरुपयोग है। साथ ही यह इस अदालत द्वारा जारी निर्देश और दिशा-निर्देश के साथ-साथ अनुच्छेद-14 और 21 के तहत मिले नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। इस पर पीठ ने केंद्र व राज्यों से जवाब मांगा।

ड्रग माफियाओं के नेटवर्क वाले पत्र पर केंद्र से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश में ड्रग माफियाओं के नेटवर्क के खतरे वाले पत्र पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र से जवाब तलब किया। सीजेआई यू यू ललित, जस्टिस एस रविंद्र भट और जस्टिस जे बी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि तत्कालीन सीजेआई एन वी रमण के समक्ष 17 नवंबर, 2021 को रखे गए कार्यालय नोट को माननीय सीजेआई के निर्देशों के तहत स्वत: रिट याचिका में परिवर्तित कर दिया गया। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि स्थिति की गंभीरता और अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री को ध्यान में रखते हुए शोएब आलम को न्याय मित्र नियुक्त करते हैं।

गिरफ्तार मंत्रियों की बर्खास्तगी पर विचार से सुप्रीम कोर्ट का इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार मंत्रियों की बर्खास्तगी की मांग वाली याचिका पर विचार से इन्कार कर दिया। वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने याचिका से दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन व महाराष्ट्र के नवाब मलिक को अस्थायी रूप से बर्खास्त करने का निर्देश देने की मांग की थी। सीजेआई यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा, यह विधायिका के विचार का मामला है और अदालत अधिकारों के पृथक्करण के सिद्धांत को देखते हुए ऐसा निर्देश जारी नहीं कर सकती।

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा, मंदिरों की प्रबंध समितियां राजनीतिक जागीर नहीं हो सकतीं। मंदिरों के प्रबंधन को राजनीति और पार्टी लाइन से अलग किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने किसी भी सत्तारूढ़ दल द्वारा अपने विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को धार्मिक ट्रस्टों की प्रबंधन समितियों को शामिल करने की प्रथा को अस्वीकार कर दिया।

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रवि कुमार की पीठ ने शिरडी के श्री साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट की प्रबंध समिति से जुड़े मामले की सुनवाई में यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, अब समय आ गया है जब राजनीतिक दलों को पार्टी लाइन से ऊपर उठकर भक्तों के हित में पूजा स्थलों के प्रशासन को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए। राजनेता कुछ मंदिरों को लेकर इतने सक्रिय क्यों हो जाते हैं और प्रबंधन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं? 

जो भी प्रबंधन में आता है, वे विभिन्न कारणों से अपने लोगों को उसमें शामिल करता है। पीठ ने पाया कि साईंबाबा ट्रस्ट की प्रबंध समिति, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 सितंबर को एक आदेश से खत्म कर दिया था, उसमें एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के सदस्य शामिल थे। महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से सहमति जताई और कहा, धार्मिक स्थलों की प्रबंध समितियां राजनीतिक जागीर नहीं बन सकतीं।

महाराष्ट्र में हुए सत्ता परिवर्तन को इस मामले में उठाना होगा कदम

यह इंगित करते हुए कि महाराष्ट्र में राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन आ गया है, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि उसका प्रयास व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना होना चाहिए ताकि सार्वजनिक ट्रस्ट, जो पूजा स्थलों का प्रबंधन करते हैं, राजनेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए अभयारण्य न बन जाए।



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