Thursday, December 8, 2022

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कूनो में चीतों को शिकारियों से बचाएगा पांच महीने का ‘इलू’, वाइल्डलाइफ कमांडो की ट्रेनिंग दे रही ITBP

नामीबिया से भारत लाए गए चीतों को भारत की धरती पर सात दिन से ज्यादा समय हो गया है। इस दौरान उनकी दिनचर्या में भी काफी बदलाव भी देखे गए हैं। इन चीतों के व्यवहार पर हर पल नजर रखी जा रही है। वहीं, नामीबिया से लाए गए चीतों के लिए सुरक्षा का सवाल बेहद अहम है। कूनो में चीतों की सुरक्षा कर पाना वन विभाग के अधिकारियों के लिए बेहद चुनौती भरा है। ऐसे में इन चीतों की सुरक्षा के लिए जर्मन शेफर्ड प्रजाति के एक कुत्ते को ट्रेनिंग दी जा रही है। पांच महीने के इस जर्मन शेफर्ड प्रजाति के कुत्ते का नाम इलू हैं। 

नामीबियाई चीतों की शिकारियों से सुरक्षा के लिए इलू भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी) के प्रशिक्षण केंद्र में ‘सुपर स्निफर’ में शामिल होने के लिए प्रशिक्षण ले रहा है। ट्रेनिंग के बाद जल्द ही इलू को जल्द ही मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में तैनात किया जाएगा। इलू उन छह कुत्तों में शामिल हैं, जिन्हें देश के अलग-अलग राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीवों की रक्षा के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

आईटीबीपी के इस नेशनल डॉग ट्रेनिंग सेंटर में ट्रेंड किए गए सुपर स्निफर दस्तों को महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु के राष्ट्रीय उद्यानों में तैनात किया गया है।

इन कुत्तों को कुल सात महीनें की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें तीन महीने की बुनियादी और चार महीने की अग्रिम ट्रेनिंग शामिल है। इस ट्रेनिंग में इन्हें अलग-अलग जानवरों के खालों को पहचानना सिखाया जा रहा है। सात महीने की ट्रेनिंग के बाद इलू सहित कुत्ते ट्रेनिंग सेंटर से वाइल्डलाइफ कमांडो बनकर बाहर आएंगे। इलू सहित उसके साथ ट्रेनिंग ले रहे अन्य कुत्तों को अगले साल अप्रैल से काम पर लगाया जाएगा। 

कूनो नेशनल पार्क में वन विभाग में काम करने वाले इलू के हैंडलर संजीव शर्मा ने बताया कि कुत्ते अपने हैंडलर के साथ एक अटूट बंधन में बंध जाते हैं। इससे उनका काम उत्कृष्ट होता है। इलू के हैंडलर संजीव शर्मा ने बताया कि वह उनके लिए एक बच्चे की तरह है। जब वह सिर्फ दो महीने की थी तह उन्होंने उसे प्रशिक्षण के लिए चुना था। नियमों के अनुसार, कुत्ते पहले दिन से लेकर सेवानिवृत्ति के दिन तक एक ही हैंडलर के साथ रहते हैं।

उन्होंने आगे बताया कि ट्रेंड कुत्तों से शिकारियों को भी भगाने में मदद मिलती है। जंगल में जहां इंसानों का शिकारियों को देखना मुश्किल होता है वहीं, ये प्रशिक्षित कुत्ते सूंघकर शिकारियों का पता लगा सकते हैं। इसलिए यहां ट्रेनिंग के दौरान कुत्तों को अलग-अलग जानवरों की खाल आदि सुंघाई जा रही है। 

संजीव ने कहा कि इलू को खासतौर पर चीतों की रक्षा नहीं करनी है, क्योंकि वे अपनी रक्षा कर सकते हैं। उसे चीतों और अन्य जानवरों को शिकारियों से बचाने के लिए वन रक्षकों के साथ राष्ट्रीय उद्यान की परिधि में तैनात किया जाएगा।

बता दें कि 17 सितंबर को मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में आठ चीतों को छोड़ा गया था। इनमें तीन नर और पांच मादाएं हैं। 24 सितंबर को चीतों को भारत की धरती पर सात दिन पूरे हो चुके हैं। करीब 70 साल पहले भारत में विलुप्त हुए चीतों को पुनर्स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष प्रयास किए थे। आठों चीते नेशनल पार्क में करीब तीन सप्ताह और क्वारंटीन में रहेंगे। इस दौरान साउथ अफ्रीका से आए 13 एक्सपर्ट उनकी हर गतिविधि पर नजर रख रहे हैं।

चीतों की सुरक्षा का भी खास ख्याल रखा जा रहा है। चीतों के क्वारंटीन बाड़ों में सोलर करंट लगाया गया है, जो तेंदुओं समेत अन्य जानवरों के खतरों से चीतों को सुरक्षित रखेगा। कूनो के जंगल में तेंदुए भी हैं। जब चीतों को जंगल में छोड़ा जाएगा तो तेंदुओं से इनकी झड़प हो सकती है। चीतों के बाड़ों में ऊपर सोलर करंट दौड़ रहा है। यह चीतों या अन्य जानवरों के लिए प्राणघातक तो नहीं है, लेकिन उन्हें डराने के लिए काफी है। इससे उन्हें हल्का झटका लगेगा जो चीतों को बाड़ों से बाहर जाने या किसी अन्य जानवर को अंदर आने से रोकेगा। वाइल्ड लाइफ फॉरेस्ट्री सर्विसेस टेक्निकल टीम के सदस्य राजीव गोप ने बताया कि साढ़े 11 फीट ऊंची फेंसिंग में सोलर करंट दौड़ रहा है। इन बाड़ों को चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया गया है। 

वहीं सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से लाए गए दो हाथियों के जरिए भी चीतों की सुरक्षा की जा रही है। यह अन्य जंगली जानवरों को चीतों के बाड़े से दूर करने का काम कर रहे हैं। शिकारियों से खतरे की कोई आशंका नहीं है, क्योंकि हर चीता सैटेलाइट कॉलर से लैस है, जिससे 24 घंटे इनकी लोकेशन वन अमले को पता रहेगी। एक ही जगह पर यदि 2 घंटे या 4 घंटे रहे और कोई मूवमेंट नहीं किया, तो अलर्ट मैसेज आ जाएगा। 

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